अनूठा हनुमत धाम- मांडविया जिसकी कथा पाताल भैरवी और रामायण युग से जुड़ी है

 हनुमान जी के मंदिर और विग्रह वैसे तो भारत भूमि के हर गांव में मिल जाएंगे, लेकिन मांडविया (हडमतिया) मंदिर का इतिहास बेमिसाल है.  बहुल वागड़ अंचल यानी राजस्थान के दक्षिणांचल जिले डूंगरपुर के पाल मांडव गांव में स्थित यह मंदिर जहाँ अनूठी परम्पराओ से जुड़ा है, वही इसका सम्बंध रामायण युग में अहीरावण से भी जुड़ा है.

पाताल भैरवी और हनुमानजी

परमार वंश के जनजाति समाज बहुल मांडव पाल में विरजमान हनुमानजी के पैरो के नीचे एक छोटा सा देवी विग्रह है, जो पाताल भैरवी का है. जिसे हनुमानजी ने पूरी ताकत से पैर से ज़मीन में दबा दिया है.

बलि का चढ़ावा

यह केवल वागड़ या राजस्थान ही नहीं पूरे भारत में शायद एकमात्र हनुमान मंदिर, जंहा पर मन्नत पूरी होने पर बलि चढ़ाई जाती हैं. समय के साथ कुछ परिवर्तन करते हुए भक्त लोग बकरे के कान पर मामूली सा निशानकर उसके रक्त की एक बूंद निकालकर, छींटा अर्पित करके मन्नत पूरी करते हैं, औऱ बकरे को उसी स्थान पर जीवित छोड़ दिया जाता है, आज भी सैकड़ो बकरे उस स्थान पर आज़ादी से घूमते हुए नज़र आ जाते हैं।

रामायण युग से सम्बंध

हनुमानजी बलि ग्रहण करते हैं ये तथ्य थोड़ा अटपटा ज़रूर लगता है, लेकिन इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. ये कहानी जुड़ती है सीधे रामायण के लंका कांड ( युद्ध कांड ) से, जिसमें एक प्रसंग के रूप में लिखी हुई हैं।

युद्ध में पराजय सामने देखकर लंकापति रावण ने श्रीराम औऱ लक्ष्मण को मारने के लिए अपने भाई पाताल लोक के अधिपति अहिरावण औऱ महिरावण का सहारा लिया और प्रार्थना की – “भैया  इन दोनों भाइयों को मार कर मेरे जीवन की रक्षा करो।"

पाताल लोक के अधिपति अहिरावण, महिरावण जो देवी पाताल भैरवी के परम् भक्त थे- जो देवी पाताल भैरवी को सहस्त्र जानवरों की बली चढ़ाने के उपरांत ही भोजन ग्रहण करते थे. जिसने अपने भाई रावण को बचाने के लिए देवी पाताल भैरवी के सामने संकल्प लिया कि राम लक्ष्मण की बलि आपके चरणों में नहीं देंगे तब तक हम दोनों भाई भोजन ग्रहण नहीं करेंगे.

उसके बाद आधी रात को अहिरावण औऱ महिरावण चुपचाप रामजी के शिविर में पहुंचे औऱ  अपनी मायावी शक्तियों से रामजी औऱ लक्ष्मण जी का अपहरण करके अपने कँधे पर बैठाकर पाताल लोक की ओर रवाना हो गए. 

                                                अहिरावण प्रसंग का संदर्भ फोटो via Internet 

इधर दिन उगने ही वाला था कि राम लक्ष्मण को नहीं देखकर वानर सेना चिंतित हो गई, हनुमानजी विलाप करने लगे और तुरंत जामवंत जी के पास पँहुचे. जामवंत जी त्रिकालज्ञानी थे. हनुमानजी ने  जामवंत जी से प्रार्थना की है--ऋषिराज जल्दी बताओ मेरे राम लक्ष्मण कहाँ चले गए हैं?

जामवंत जी ने दिव्यदृष्टि से देखा औऱ बताया कि हे हनुमान जल्दी से जल्दी पाताललोक जाओ और राम लक्ष्मण को बचालो, वरना अनर्थ हो जाएगा, अहिरावण-महिरावण ने हमारे प्रभु का अपहरण किया है और रामजी मुश्किल में फँस गए हैं.


हनुमानजी तुरंत पाताल लोक की ओर रवाना हो गए. पाताललोक में अहिरावण के विशाल महल का द्वारपाल मकरध्वज नामक वानर था, जो हनुमानजी जैसा ही शक्तिशाली था. जब हनुमानजी ने महल में घुसने की कोशिश की तो मकरध्वज ने हनुमानजी को महल में जाने से रोका. फ़िर हनुमानजी औऱ मकरध्वज का भयंकर युद्ध हुआ (यह कहानी भी विस्तृत है, जिसकी पूरी चर्चा यंहा पर सम्भव नहीं है)

जब दोनों के युद्ध का कोईं परिणाम नहीं निकला तो हनुमानजी ने पूछा, “हे वानरराज राक्षस तुम कौन हो? तुम्हारे पिता कौन है ?” मकरध्वज ने कहा कि “मेरे पिता महावीर हनुमानजी हैं !!”

हनुमानजी को आश्चर्य हुआ, दोनों में नोकझोंक हुई, चर्चा हुई तो मकरध्वज ने बताया कि-हनुमानजी द्वारा लंका दहन के बाद समुद्र में अपनी पूंछ बुझाने समुद्र में गोता लगाया ठीक उसी समय मादामगर ( घड़ियाल ) के मुंह में हनुमानजी के पसीने की बूंदों के गिरने से मेरी माँ (मादा मगर) ने गर्भ धारण किया औऱ उनकी कोख़ से  मेरा जनम मकरध्वज के रूप में  हुआ.

तब हनुमानजी ने बताया कि मै ही हनुमान हूँ. इस प्रकार हनुमानजी औऱ मकरध्वज   (पिता- पुत्र ) आपस में प्रसन्नता से गले मिले,मकरध्वज हनुमानजी के चरणों में पड़ कर माफ़ी मांगने लगा. जब मकरध्वज ने अपने स्वामी से गद्दारी नहीं करने और हनुमानजी को महल में नहीं घुसने की बात कही तो हनुमानजी ने मकरध्वज को नागपाश से बाँध दिया औऱ फ़िर हनुमानजी ने महल के रास्ते की जानकारी माँगी तो मकरध्वज ने हनुमानजी को महल का रास्ता बताया औऱ कहा कि जल्दी पँहुच कर राम लक्ष्मण को बचा लो वरना देर हो जाएगी.

 उधर देवी को राम लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी. पहले जानवरों की बलि देनी थी और फ़िर राम लक्ष्मण की !! हनुमानजी ने अंदर जा कर देखा तो भयानक दृश्य को देखकर अचंभित रह गए. बलि देने से पहले देवी को पहनाने के लिए फूलों के बड़े बड़े पुष्पहार रखे हुए थे. हनुमानजी ने अति सूक्ष्म रूप धरकर भँवरा बन कर पुष्पहार में घुस गए.

जब अहिरावण ने जैसे ही देवी को हार पहनाया, हनुमानजी ने अपना रूप बदलकर देवी का रूप धारण किया औऱ देवी को अपनी पूरी ताकत से पैर के नीचे दबाकर देवी रूप में स्वयं अनेकों जानवरों को भक्षण के लिए देवी पाताल भैरवी से बलि ग्रहण करने का आग्रह किया. यहीं से इस स्वरूप में हनुमानजी को बलि चढ़ाने चलन शुरु हुआ.  

और जैसे ही राम लक्ष्मण की बलि देने के लिए देवी के समक्ष प्रस्तुत किया गया तो, देवी के रूप में बैठे हुए हनुमानजी ने रौद्र रूप धारण कर भगवान राम, लक्ष्मण जी को अहिरावण महिरावण के नागपाश से मुक्त किया तथा भगवान श्री राम, लक्ष्मण औऱ हनुमानजी ने मिलकर अहिरावण और महिरावण का वध किया. पाताल लोक के अनेक खूँखार राक्षसों का संहार किया और राम लक्ष्मण को अपने कन्धे पर बैठा कर मकरध्वज की मदद से पाताललोक से सुरक्षित बाहर निकाल कर भगवान राम लक्ष्मण को युद्ध के शिविर में पंहुचाया.

भगवान राम ने हनुमानजी के इस पराक्रम औऱ वीरता से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि आपके इस देवी रूप के सामने कलयुग में जो भी भक्त सच्चे दिल से जो भी मन्नत मांगेगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी वो ही देवी स्वरूप में हनुमानजी हमारे वागड़ के गाँव मांडव (तहसील दोवडा ) जिला डूंगरपुर राजस्थान की धरती पर प्रकट हुए हैं। सैकड़ो--हजारों भक्त मांडविया हनुमानजी (हड़मतिया) की आराधना करते हैं और अपने मनोरथ को पूरा करते हैं.

परमार वंश के प्रमुख आराध्य तो हैं ही, सम्पूर्ण सनातन समाज के लोग में मांडविया (हडमतिया ) हनुमानजी के प्रति अगाध आस्था है. हर मंगलवार और शनिवार को सैकड़ो भक्त दर्शन के लिए आते हैं और इस स्थान पर मेला लगता है. वर्ष में एक बार दीवावली के बाद वाली कार्तिक मास की पूर्णिमा को 3 दिन का विशाल मेला लगता है जिसमे गुजरात, मध्यप्रदेश, मेवाड़ से भारी संख्या में दर्शनार्थी दर्शन करने के लिए आते हैं.

सदियो पहले आदिवासी अंचल में हमारे पूर्वजो के शास्त्र ज्ञान और उसके अनुसार अर्चन-अनुष्ठान आश्चर्यजनक है.  इस मंदिर के पुजारीगण भी पाल मांडव और आस पास गांवो से जनजाति समाज से आते हैं. लाल पत्थरों से बना यह नव निर्मित भव्य मंदिर नई पीढ़ी को भी खासा आकर्षित करता है. इस प्रकार आज भी देवी रूप में विराजमान श्री मांडविया हनुमानजी के चमत्कार भक्तजनो को आत्मबल प्रदान करते हैं और उनका प्रभाव-पराक्रम समूचे वागड़ ही नहीं अपितु पूरे देश में प्रकाशमान हो रहा है.

उक्त कथा में वाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस औऱ अन्य भाषाओं की रामायणों में थोड़ी बहुत भिन्नता जरूर हो सकती है, फ़िर भी सत्यता से रूबरू कराने की मेरी कोशिश रही है. करीब 49 साल पहले मेरे पिताजी ( ज्योतिषी धुलजी भाई पँचाल ) ने मुझे बताई थी, उसी के आधार पर सर्व समाज के सामने रख रहा हूँ. 


मन्दिर के ट्रस्ट मंडल से निवेदन- 

आपके द्वारा एक अलौकिक चमत्कारिक श्री हनुमानजी के  मन्दिर का जीर्णोद्धार कर हम वागड़वासियो के दर्शन, पूजा, अर्चन करने के लिए बहुत बड़ी सौगात दी है. जिसके लिए सभी आसपास के 9 गाँवो के आदिवासी समाज को हार्दिक साधुवाद।

परन्तु मन्दिर के आसपास  मन्दिर से सटकर जो दुकानें, थडिया लगाई गई है उनको थोड़ा दूरी पर बैठा कर मन्दिर के अंदर औऱ बाहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. मन्दिर के आसपास प्लास्टिक, पॉलीथिन एवं मन्दिर के अंदर अगरबत्ती जलाने को पूरी तरह बेंड करना चाहिए, जिससे मन्दिर की सुरक्षा बढ़े एवं मन्दिर की ख्याति  प्रसिद्धि पूरे प्रदेश में प्रकाशमान हो।

-भगवतीलाल पँचाल सामलिया, रिटायर्ड नायब तहसीलदार एवँ जितेंद्र जवाहर दवे  (सम्पादक) 



38 टिप्‍पणियां

बेनामी ने कहा…

सुंदर आलेख

बेनामी ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद
सटीक शास्त्रोक्त जानकारी के लिए अभिनन्दन बधाई हो।

बेनामी ने कहा…

धार्मिक कार्य में सामाजिक कार्य में हर क्षेत्र में आपकी रुचि सेवा काल में सेवाकाल के बाद में
बढ़ चढ़कर देखने को मिलती है
भगवान मांडवीया हनुमान जी के बारे में एकदम सटीक और सार्थक परिभाषा
पढ़कर मन बहुत खुश हुआ बहुत शानदार
जय बजरंगबली जय श्री राम

बेनामी ने कहा…

उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद🙏आभार🕉️🚩

बेनामी ने कहा…

आप जैसे विद्वानों का आशिर्वाद शिरोधार्य।🙏🕉️🚩

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर एवं ज्ञानवर्धक आलेख, रामायण काल के अंतर कथा को अपने सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया जीससे हनुमान जी के इस रूप की सुंदर जानकारी प्राप्त हुई 🙏🙏 - केशव लाल लोहार ऋषभदेव

बेनामी ने कहा…

आप जैसे विद्वानों, सज्जनों का सानिध्य, आशीर्वाद सेवानिवृत्ति के बाद भी धर्म कार्यो में ,सामाजिक जीवन में ऊर्जावान औऱ गतिशील बनाये रखता है।
आपका आशीर्वाद बना रहे।🙏🕉️🚩

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद, ,,,,केशवजी🙏आपका औऱ भगवान ऋषभदेव का आशीर्वाद बना रहे।🙏🌷

बेनामी ने कहा…

👌 अति सुंदर

बेनामी ने कहा…

आभार: मुकेश द्विवेदी, उदयपुर

बेनामी ने कहा…

मुझे विश्वास है--मनगढ़ंत कहानियां औऱ तरह तरह की भ्रांतियां इस स्थान पर बलि देने के विषय में लोगों के दिमाग में है जो यह आलेख पढ़कर दूर होंगी और भक्त लोग हनुमानजी के इस रूप की सटीक जानकारी से अवगत होंगे।
*🌷यहां पर दी जाने वाली बलि पातालभैरवी ग्रहण करती है न कि हनुमानजी।*,🌷

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद🙏🕉️🌷

बेनामी ने कहा…

साधुवाद, आभार🙏🕉️🌷

बेनामी ने कहा…

सर आपका आशीर्वाद बना रहे

बेनामी ने कहा…

शानदार अद्भुत। एतिहासिक जानकारी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। नई पीढ़ी के लिए ये ज्ञान अमृत के समान हे।।।

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर, हनुमानजी को बलि चढ़ाई जानें के बारे में वास्तविकता कि जानकारी जन जन तक पहुंचा ने का प्रयास बहुत ही सराहनीय।

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद🙏🕉️🚩

जितेन्द्र पंचाल ने कहा…

अतिसुंदर ... आज तक मुझे ये भ्रम था कि हनुमानजी को बलि... उसका जवाब आपके लेख द्वारा मिल गया।

विनोद पंड्या भीलूडा ने कहा…


10:43 am
धार्मिक कार्य में सामाजिक कार्य में हर क्षेत्र में आपकी रुचि सेवा काल में सेवाकाल के बाद में
बढ़ चढ़कर देखने को मिलती है।
भगवान मांडवीया हनुमान जी के बारे में एकदम सटीक और सार्थक परिभाषा जो मेरी और कई सनातनियों की जानकारी में नहीं था जो आपने अवगत कराया। हमारे वागड़ क्षेत्र में एसे पौराणिक और चमत्कारिक पवित्र पूजनीय स्थल है उनके बारे में आप द्वारा जानकारी उपलब्ध होती रहेगी ये ही मंगलकामना है।
आलेख पढ़कर मन बहुत खुश हुआ,सनातन धर्म के संरक्षण के लिए आपके प्रयास प्रशंसनीय है बहुत बहुत आत्मीय आभार
जय बजरंगबली जय श्री राम

विनोद पंड्या भीलूडा ने कहा…


10:43 am
धार्मिक कार्य में सामाजिक कार्य में हर क्षेत्र में आपकी रुचि सेवा काल में सेवाकाल के बाद में
बढ़ चढ़कर देखने को मिलती है
भगवान मांडवीया हनुमान जी के बारे में एकदम सटीक और सार्थक परिभाषा की जानकारी मिलीं।
सनातन धर्म का संरक्षण हम सभी करते रहे ।
पढ़कर मन बहुत खुश हुआ बहुत शानदार
जय बजरंगबली जय श्री राम

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर, आज हनुमानजी के जन्मोत्सव पर सभी हनुमत भक्तों को उनके अनकहे प्रश्न का उत्तर जानने का आपके माध्यम से सौभाग्य प्राप्त हुआ ! आपका साधुवाद!!स्वाभाविक रूप से हर जिज्ञासु भक्त के मन में जिसने भी वहां दर्शन किये और बलि की उसको जानकारी हुई, कौतुहलवश ही सही पर...कहीं न कहीं मन में यह जानने-समझने की इच्छा रहीं है, निःसंदेह आपके द्वारा इस आलेख के माध्यम भक्तों की जिज्ञासा अवश्य ही पूरी हुई है, धन्यवाद!!

SURESH PANCHAL ने कहा…

हनुमान जन्मोत्सव पर सटीक एवं रोचक जानकारी से कई पूर्व प्रश्नों का समाधान हुआ। मेरे जैसे कई भक्तों की जिज्ञासा शांत हुई। आपकी लेखनी को साधुवाद।

बेनामी ने कहा…

पूरी जानकारी शास्त्रोक्त हैं।
संतो के प्रवचन में उद्धृत हैं।

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद,,,, सरजी🙏 आपका आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिलता रहे।🙏

बेनामी ने कहा…

बिल्कुल सर ---कितने ही दिनों से मेरे मन में उत्कंठा थी कि लोगों के मन के भ्रंम को कैसे दूर करू,,,,,कई लोग मन्दिर परिसर में बलि देने की प्रथा से अनभिज्ञ थे।
मुझे वागड़ वायरल का बेस मिला और मैने लगभग 49 साल पहले मेरे पिताजी श्री धुलजी भाई के मुख से जो कथा सुनी थी औऱ बाद में रामायण में मैने पढ़ी भी थी,,,,,उसको हुबहु लिखने की कोशिश की गई हैं।🙏🚩🎪

बेनामी ने कहा…

जी, सर,,,,🙏धन्यवाद ,,,,मेरे प्रयास का अनुमोदन करने के लिए।🙏🎪🚩

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद🙏 इस आलेख को अधिक से अधिक लोगों तक पँहुचा कर लोगों का भरम दूर करने में सहयोग करें।🎪💥🎄

बेनामी ने कहा…

पंचाल जी आध्यात्मिक व्यक्तित्व के धनी है। आपने सुदूर मंदिर की सार्थक और सारगर्भित जानकारी देकर सभी के मन में मंदिर की उत्कंठा पैदा की।

बेनामी ने कहा…

🌺🎊 आशीष 🎊🌺

बेनामी ने कहा…

अवश्य---सपरिवार दर्शन के लिए मंगलवार या शनिवार को पधारे।
मांडविया हनुमानजी की ख्याति औऱ चमत्कार की कहानियां जगजाहिर है।
मांडविया दादा दर्शनार्थ आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं।🙏🎪🕉️

बेनामी ने कहा…

🎊 साधुवाद 🎊

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद, आभार🙏🎪🎄

बेनामी ने कहा…

अति सुंदर प्रशंसनीय

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद🙏😌

बेनामी ने कहा…

सटीक जानकारी

बेनामी ने कहा…

जी, सर🙏😌 हमारे ऋषिमुनियों की अनुपम देन।💥

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद, सर।🙏एक बार दर्शन लाभ जरूर ले।

बेनामी ने कहा…

सटीक जानकारी, वागड़ क्षेत्र सदियों से धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है। यहां के धार्मिक स्थलों पर शोध और लेखन की प्रचुर सम्भावनाएं हैं। वायरल वागड़ के माध्यम से श्री जितेंद्र दवे जी और श्री बीएल पंचाल जी के प्रयासों के लिए साधुवाद।
अखिलेश पंड्या, पत्रकार