सेमल की लकड़ी रगड़कर तैयार की जाती है अग्नि, उसी से जलती है होली-टामटिया में 200 साल पुरानी परंपरा
दक्षिणी राजस्थान के सागवाड़ा क्षेत्र के टामटिया गांव में करीब 200 साल
पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उसी स्वरूप में निभाई जा रही है। आधुनिक समय
में माचिस और लाइटर जैसे साधन आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद गांव में होली जलाने
के लिए सेमल की लकड़ी, आंक की लकड़ी और गाय के गोबर के कंडों
की सहायता से पारंपरिक तरीके से चिंगारी तैयार की जाती है और उसी अग्नि से होली
दहन किया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि होली के लिए अग्नि भी पवित्र होनी
चाहिए, इसलिए इसे प्राकृतिक और शुद्ध तरीके से तैयार किया
जाता है।
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा की रात को होली जलाने से पहले गांव के भोपा परिवार को अग्नि तैयार करने के लिए विशेष निमंत्रण दिया जाता है। भोपा परिवार की चौथी पीढ़ी के लक्ष्मण भाई डामोर द्वारा टामटिया गांव के मुख्य होली चौक पर परिवार और गांव के युवाओं के सहयोग से सेमल की लकड़ियों को आपस में रगड़कर अग्नि तैयार की जाती है। इस दौरान युवक लकड़ी और कंडों से होली सजाते हैं।
होली का डांडा (थम्ब) परंपरा के अनुसार
सरपोटा परिवार द्वारा लाया और स्थापित किया जाता है। स्वर्गीय सोमा सरपोटा के बाद
अब यह परंपरा धुला भाई सरपोटा निभा रहे हैं। इसके बाद भोपा परिवार के प्रतिनिधि और
गांव के वागड़िया पाटीदार समाज के प्रतिनिधि मिलकर घास के चार पुलों (गठरी) के साथ
होली की प्रदक्षिणा करते हुए होली दहन करते हैं। घांस के पुलों को चार दिशाओं का
प्रतीक माना जाता है।
भोपा परिवार करता है गौषण बावजी व कालिका
माता की सेवा:
होली के लिए सेमल की लकड़ी रगड़कर अग्नि
तैयार करने वाला भोपा डामोर परिवार कई पीढ़ियों से गांव के क्षेत्रपाल गौषण बावजी,
कालिका माता और धाई माता की सेवा-पूजा करता आ रहा है। लक्ष्मण डामोर
के पिता स्व. मोगा भाई, उनके पिता स्व. कोदर भाई और उनसे
पहले स्व. खेमजी डामोर भी इस परंपरा का निर्वहन करते रहे हैं। वर्तमान पीढ़ी के
साथ ही अगली पीढ़ी के बच्चों में भी इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह देखने को मिलता
है।
गांव के धूलजी पगारिया, धूलजी लालजी कोयलात, गटुभाई कोयलात, वेलजी भाई सांसियोत, जगजी भाई, देवजी भमोत, बाला नगजी पाटीदार, महेशचंद्र सुथार और भरत सोनी ने बताया कि टामटिया में मुख्य होली दहन के बाद अगले दिन पाटीदार समाज, प्रजापत, सुथार, सोनी, लुहार, दर्जी और कलाल सहित विभिन्न समाजों के लोग अपने नवजात बच्चों की ढूंढ रस्म के तहत होली का पूजन और प्रदक्षिणा करते हैं। गांव के आदिवासी समाज के रातेड़ा और भागेला फलों के महिला-पुरुष व ब्राह्मण समाज समेत सर्व समाज साथ में गैर खेलते हैं। महिलाएं लहरिया गरबा खेलती हैं। यहां खास बात यह है कि एक साथ 50 से अधिक ढोल और कुंडियों की थाप पर लोग गैर खेलते हुए एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं। अग्नि तैयार करने वाले भोपा परिवार और होली का डांडा लाने वाले सरपोटा परिवार के प्रतिनिधियों का गांव की ओर से धोती, रुमाल और नारियल भेंट कर सम्मान किया जाता है।
पवित्र रहना और आसपास का वातावरण शुद्ध
-सात्विक होना आवश्यक:
होली जलाने के लिए सेमल की लकड़ी को पवित्र माना जाता है। यह लकड़ी चिकनी होती है, इसलिए दो लकड़ियों को विशेष तरीके से आपस में रगड़ने और पास में आंक की कोमल लकड़ी व गाय के गोबर के उपले (कंडे) रखने से चिंगारी निकलकर धीरे-धीरे अग्नि में बदल जाती है। लक्ष्मण डामोर बताते हैं कि इसके लिए स्वयं का पवित्र रहना और आसपास का वातावरण भी शुद्ध व सात्विक होना आवश्यक है। कई बार बाहर से लोग इसे देखने आते हैं और यदि किसी ने नशा किया हो तो पूरी रात प्रयास करने के बावजूद अग्नि तैयार नहीं हो पाती, तब स्नान कर पुनः प्रयास करना पड़ता है।
- अखिलेश पंड्या, वरिष्ठ पत्रकार, सागवाड़ा


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