छींच का गणेश मंदिर- श्रीराममंदिर की तर्ज पर बना, न लोहा, न सीमेंट लेकिन अदभुत शिल्प-सौंदर्य
मकराना के सफेद संगमरमर से बना गणपति मंदिर, दिव्य एवम अलौकिक छटा बिखेरता है.
दक्षिणी राजस्थान के वागड़ अंचल ने हमेशा धर्म और संस्कृति को सींचा है. बांसवाड़ा जिला
मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर आध्यात्मिक नगरी के नाम से
प्रसिद्ध ब्रह्मधाम की स्थली छींच गांव में वैसे तो मंदिरों की एक श्रृंखला
प्राचीन समय से चली आ रही है, जिसमे विश्व प्रसिद्ध ब्रह्माजी मंदिर, राम मंदिर, शीर्षा देवी मंदिर आदि है। इसी क्रम में श्रद्धालुओं
का आस्था का केंद्र बना हुआ है सिद्धिविनायक मंदिर.
मकराना के सफेद संगमरमर से नवनिर्मित भव्य और दिव्य सिद्धिविनायक मंदिर और साथ ही समीप स्थित शिव मंदिर दूर से ही
श्रद्धालुओ को आकर्षित कर रहे है।
काष्ठ से कलात्मक संगमरमर- सवा सौ साल का सफ़र
मंदिर निर्माण समिति के हरिश्चंद्र
उपाध्याय ने बताया कि प्राचीन समय में गांव के बाहर इमली के पेड़ के नीचे
सिद्धिविनायक की प्रतिमा स्थापित थी, लोग आते
जाते सिर नवाते थे, और अपनी समस्याएं उनके सामने रखते थे
चमत्कारी विग्रह से लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती गई। चमत्कारों से प्रभावित होकर
लगभग 125 वर्ष पूर्व स्थानीय गणपति मोहल्ले के लोगों ने एक
लकड़ी का मंदिर बनवाया और इस मंदिर में इमली के पेड़ के नीचे स्थापित प्रतिमा को
लाकर काष्ठ मंदिर में स्थापित की गई। धीरे-धीरे यह मंदिर गांव की आस्था का केंद्र
बन गया और यहा निरंतर संत महात्माओं का का आवागमन होता रहा।
लेकिन कुछ साल पहले दुर्घटनावश मंदिर में आग लग गई जिससे मंदिर का काफी भाग जलकर नष्ट हो गया लेकिन गर्भ ग्रह और विग्रह सुरक्षित रहा। ऐसी परिस्थितियों में मोहल्ले के द्वारा मंदिर जीर्णोद्धार प्रारंभ किया जिस पर गांव वालों के सहयोग से 75 वर्ष पूर्व ईंट,चुने का नया मंदिर बनाया और प्राण प्रतिष्ठा करवाई।
संत श्री कमलानंद जी महाराज यहाँ रहे और
कई धार्मिक आयोजन करवाएं। कमलानन्द जी
महाराज के कैलाशवासी होने पर मंदिर परिसर में समाधि करवाई गई और वर्तमान में उसी
स्थान पर समाधि बनी हुई है।
कमलानंद जी महाराज के पश्चात मोहल्ले के रामशंकर उपाध्याय एवं रामा फुआजी के मार्गदर्शन में मोहल्ले में निरंतर धार्मिक आयोजन चलते रहे जिनमे प्रत्येक बुधवार भजन मंडली, प्रति वर्ष गणेशोत्सव, श्रावण मास में पूजन आदि।
सिद्धि विनायक मंदिर गांव के सबसे निचले
धरातल पर स्थित है. जिससे पिछले कुछ वर्षों में बरसात का पानी मंदिर में घुस आता
है जिससे कारण स्थानीय मंदिर समिति द्वारा महंत घनश्याम दास जी महाराज से
मार्गदर्शन लिया एवं उनके मार्गदर्शन में नवीन प्रस्तर मंदिर का भूमि पूजन 15 जून 2020 एवम शिलान्यास 24
जून 2020 को धूमधाम से किया गया।
मंदिर निर्माण समिति के रूपेंग पटेल ने
बताया की भगवान की कृपा से मोहल्ले में निवासरत सोलंकी समाज,
मसानी समाज, त्रिवेदी मेवाड़ा ब्राह्मण समाज
एवम सुथार समाज के परिवारों द्वारा मुक्त हस्त से दान देकर इस पुण्य कार्य को
प्रारंभ किया गया, मंदिर निर्माण की प्रगति को देखते हुए
गांव के अन्य लोगो ने भी स्वैच्छिक अपना सहयोग देना प्रारंभ किया जिससे मंदिर
कार्य पूर्णता की और बढ़ रहा है।
कोषाध्यक्ष शैलेंद्र पंड्या ने बताया की 2 करोड़ की लागत से बने इस मंदिर की कुल ऊंचाई 61 फीट है।
अयोध्या के राम मंदिर की तर्ज पर बना
मंदिर
बिना सीमेंट और लोहे के,
सिर्फ़ पत्थरो की इंटरलॉकिंग से बनाया यह मंदिर अयोध्या के श्रीराम मंदिर
और डूंगरपुर के देव सोमनाथ मंदिर की याद दिलाता है. और वास्तु शिल्प व कारीगरी की अनुपम
मिसाल बनाता है. अयोध्या में बन रहे श्री राम मंदिर की तरह इसमें भी जिसमे 10 फीट नींव एवम 10 फीट उससे ऊपर कुल 20 फीट पत्थरों की चुनाई से पेढ़ी निर्माण करवाया गया है। मंदिर की ऊंचाई
फ्लोरिंग लेवल से 51 फीट है। गर्भगृह के बाद विशाल रंगमंडप
और मंडप में तीन श्रृंगार चौकियां व तीन ही दरवाजे है। परिक्रमा मार्ग पर ही शिव
मंदिर तथा संत श्री कमलानंद जी महाराज की समाधि निर्माण भी पूर्ण हो चुका है। सफेद
संगमरमर से बना होने के कारण यह दर्शनीय मंदिर प्रसिद्ध प्रेम मंदिर जैसी आभा बिखेरता
है.
वास्तु शिल्पी जीतूभाई पिंडवाडा की देखरेख
में मकराना के कुम्हारी पत्थर से निर्मित इस मंदिर को पिंडवाड़ा ,
मकराना एवम भरतपुर के के कारीगरों ने सुंदर कलाकृतियों को तराश कर
भव्य एवम सुंदर प्रासाद का निर्माण किया हैं जो लोगो को बरबस ही आकर्षित कर रहा है,
भव्य मंदिर निर्माण के पश्चात अब प्राण प्रतिष्ठा को लेकर मोहल्ले
के छोटे बड़े सभी लोगो में अपार उत्साह है साथ ही कुवैत आदि देशों में रोजगाररत
युवा भी अपना सहयोग प्रदान कर रहे है।
07 फरवरी से 11 फरवरी 2026 को भव्य प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित किया जा रहा है।
~आशीष उपाध्याय,
छींच, बांसवाड़ा




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